1. बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.)-
यह शिलालेख बिजौलिया (भीलवाड़ा) के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक
चट्टान पर उत्कीर्ण किया गया है
यह शिलालेख संस्कृत भाषा में लिखा हुआ
है
बिजौलिया शिलालेख से सांभर और अजमेर
के चौहान वंश के बारे में जानकारी मिलती है।
इस शिलालेख के रचयिता गुणभद्र तथा
लेखक कायस्थ केशव थे।
इस शिलालेख के अनुसार चौहानों की
उत्पत्ति वत्सगौत्रीय ब्राह्मण से हुई है।
बिजौलिया शिलालेख में विभिन्न नगरो के
प्राचीन नाम वर्णित है
बिजौलिया शिलालेख की स्थापना 1170 ईं. में जैन श्रावक लोलाक ने की थी
बिजौलिया शिलालेख उत्कीर्णकर्ता
गोविन्द थे
इस शिलालेख के अनुसार वासुदेव चौहान ने अहिछात्रपुर (नागौर) को चौहान
साम्राज्य की राजधानी बनाया।
इस शिलालेख में बिजौलिया के आस-पास के पठारी भाग को उत्तमाद्री कहा गया है जिसे वर्तमान में उपरमाल के नाम से जाना जाता है।
इस लेख में कई क्षेत्रों के प्राचीन नाम दिए गये है – जैसे –जाबालिपुर (जालौर), श्रीमाल (भीनमाल), शाकम्भरी (सांभर), नड्डुल (नाडौल), ढ़िल्लिका (दिल्ली), नागह्रद (नागदा), मांडलकर (मांडलगढ़), विंध्यवल्ली (बिजौलिया), उत्तमाद्री (उपरमाल) आदि।
यह मूलत: दिगम्बर लेख है।
बिजौलिया शिलालेख में महाराज वासुदेव चौहान द्वारा चौहान वंश की स्थापना तथा सांभर झील बनवाने का उल्लेख है।
बिजौलिया शिलालेख से ज्ञात होता है की विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली को अपने अधीन किया था
2. घोसुंडी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)
यह शिलालेख घोसुण्डी गाँव ( चित्तौड़गढ़ ) में प्राप्त हुआ है
इस शिलालेख पर संस्कृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
इस शिलालेख में गजवंश के पाराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराने एवं विष्णु मन्दिर की चार दिवारी बनवाने का उल्लेख मिलता है।
यह राजस्थान में वैष्णव (भागवत) संप्रदाय का सबसे प्राचीन अभिलेख है।
घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया
3. अशोक के शिलालेख/विराट नगर अभिलेख
अशोक के शिलालेख विराट नगर / बैराठ (जयपुर) में मिले ।
जयपुर में स्थित विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर दो शिलालेख मिले ।
1. भाब्रू अभिलेख-भाब्रू शिलालेख 1837 ई. में कैप्टन बर्ट द्वारा खोजा गया था जिसे 1840 ई. कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया
भाब्रू शिलालेख में अशोक ने अपने आपको मगध का राजा कहा है। यहां से प्राप्त स्तंभ लेखों में बुद्ध , धम्म , तथा संघ नामक 3 शब्द ब्राह्मी लिपि में लिखे हुए मिले हैं।
भाब्रू शिलालेख से सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है
2. बैराठ शिलालेख- यह शिलालेख 1877 ई. में कालाईल द्वारा खोजा गया
4. बड़ली शिलालेख (443 ई० पू०)
बड़ली शिलालेख बडली (अजमेर ) गांव में भिलोत माता के मंदिर से स्तंभ के टुकडो से प्राप्त हुआ।
यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ है|
राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है
यह शिलालेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा के द्वारा खोजा गया था
यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में राजपुताना संग्रहालय (अजमेर) में सुरक्षित है
5. मानमोरी शिलालेख (713 ई.)
यह शिलालेख पूठोली गांव (चित्तौड़गढ़) के समीप मानसरोवर झील के तट पर मिला।
इस शिलालेख में अमृत मंथन का उल्लेख है ।
इस शिलालेख का लेखक पुष्य तथा उत्कीर्णकर्ता शिवादित्य था।
कर्नल जेम्स टॉड ने इंग्लैण्ड जाते समय इसे समुद्र में फेंक दिया था ।
यह शिलालेख मौर्य वंश की जानकारी देता है।
इस शिलालेख की प्रतिलिपि कर्नल जेम्स टॉड के ग्रंथ एनल्स एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान के प्रथम भाग में प्रकाशित है।
6. नांदसा युप-स्तम्भ लेख (225 ई. पू.)
यह शिलालेख भीलवाड़ा के निकट नांदसा स्थान (भीलवाड़ा) पर एक सरोवर में प्राप्त गोल स्तंभ पर उत्कीर्ण है।
इस स्तम्भ लेख की स्थापना सोम द्वारा की गई थी ।
इस लेख से उत्तरी भारत में प्रचलित पौराणिक यज्ञों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है
यह स्तम्भ लेख तालाब के मध्य में स्थित होने के कारण वर्ष के उन्हीं दिनों में पढ़ा जा सकता है, जब तालाब सूख जाता है
इस अभिलेख में शक्ति गुणगुरु नामक व्यक्ति द्वारा षष्ठिरात्र यज्ञ किए जाने का वर्णन है।
7. नगरी शिलालेख
यह शिलालेख चितौड़गढ़ के नगरी नामक स्थान से प्राप्त हुआ
इस अभिलेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है
यह शिलालेख नगरी का सम्बन्ध विष्णु की पूजा से बताता है।
8. चीरवा का शिलालेख (1273 ई.)
यह शिलालेख चीरवा गाँव(उदयपुर) में एक मंदिर के बाहरी द्वार पर लगा हुआ है
यह 36 पंक्तियों और 51 श्लोकों का शिलालेख है जिसकी भाषा संस्कृत व लिपि देवनागरी लिपि है
यह शिलालेख मेवाड़ के गुहिलवंशी राणाओं की समरसिंह के काल तक की जानकारी प्रदान करता है।
इस शिलालेख से सामाजिक कुरीतियों जैसे सती प्रथा की जानकारी मिलाती है
यह शिलालेख बाप्पा के रावल के वंशजों की उपलब्धियों का वर्णन हैं।
रत्नप्रभसुरी ने चिरावा शिलालेख की रचना की और पार्शवचंद इसके लेखक थे
9. किराडू का शिलालेख (1161ई.)
किराडू शिलालेख किराडू (बाड़मेर) के शिव मंदिर में संस्कृत में 1161 ई. का उत्कीर्ण लेख है
किराडू शिलालेख में परमार शाखा की वंशावली का वर्णन है। जिसमें परमारो की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है।
10. सांमोली शिलालेख (646 ई.)
सांमोली (भोमट तहसील-उदयपुर) में प्राप्त हुआ
सांमोली शिलालेख में प्रयुक्त भाषा संस्कृत और लिपि कुटिल है
इससे यह भी संकेत मिलता है कि जावर के निकट के अरण्यगिरि में तांबे और जस्ते की खानों का काम भी इसी युग से आरम्भ हुआ हो।
यह शिलालेख गुहिलवंश के शासक शिलादित्य के समय का हैं, तथा यह शिलालेख शिलादित्य के समय की आर्थिक व राजनीतिक जानकारी देता हैं।
डॉ. ओझा ने इसको अजमेर संग्रहालय में रखवा दिया था,
गुहिलादित्य के समय के इस शिलालेख में लिखा गया है कि ‘‘वह शत्रुओं को जीतने वाला, देव ब्राह्मण और गुरूजनों को आनन्द देने वाला और अपने कुलरूपी आकाश का चन्द्रमा राजा शिलादित्य पृथ्वी पर विजयी हो रहा है।’’
जेंतक मेहतर ने अरण्यवासिनी देवी का मन्दिर बनवाया था, जिसे जावर माता का मन्दिर भी कहते हैं।
उदयपुर से प्राप्त यह शिलालेख गुहिल शासक शिलादित्य के समय का है।
11. श्रृंगी ऋषि शिलालेख (1428 ई.)
यह एकलिंगजी/कैलाशपुरी (उदयपुर) के पास श्रृंगी ऋषि नामक स्थान से खंडित अवस्था में मिला है।
श्रृंगी ऋषि शिलालेख के रचनाकार वाणी विलास योगेश्वर थे
यह लेख राणा मोकल के समकालीन है
यह शिलालेख मेवाड़ के महाराणाओं के बारे में विस्तृत वर्णन करता है I
इसमें उल्लेख है की राणा लाखा ने काशी, गया एवं प्रयाग जाने वाले हिन्दुओं से कर हटवाकर इन तीनो स्थानों पर शिव मंदिर का निर्माण कराया था
यह संस्कृत भाषा उत्कीर्ण लेख है और इसमें 30 श्लोक हैं।
इस शिलालेख में भीलों के सामाजिक जीवन का भी वर्णन किया गया है
यह लेख मोकल के समय का है, जिसने अपने धार्मिक गुरु के आदेश से, अपनी पत्नी गौरम्बिका की मुक्ति के लिए श्रृंगी ऋषि के पवित्र स्थान पर एक कुंड बनवाया था।
इस लेख में लक्ष्मण सिंह और क्षेत्र सिंह की त्रिस्तरीय यात्रा का वर्णन मिलता है। जहां उन्होंने दान में विपुल धनराशि दी और गया में मंदिरों का निर्माण करवाया।
12.बसंतगढ़ शिलालेख (625 ई.)
यह शिलालेख चावडा वंश के शासक वर्मलात के समय का माना जाता है।
यह शिलालेख बसंतगढ़ (सिरोही) से प्राप्त हुआ है।
इस अभिलेख में सामन्त प्रथा का उल्लेख मिलता है।
इसकी भाषा संस्कृत और लिपि कुटिल है।
13. कणसवा का अभिलेख-(738 ई.)
यह अभिलेख कोटा के निकट कणसवा गाँव में उत्कीर्ण है
इस शिलालेख में मौर्य वंश के राजा धवल का उल्लेख मिलता है।
कणसवा व मानमोरी शिलालेख पुठोली (चित्तौड़) के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि मौर्य का राजस्थान से संबंध था।
14. आमेर का शिलालेख (1612 ईं)
आमेर का शिलालेख आमेर दुर्ग (जयपुर) में है
आमेर का शिलालेख संस्कृत भाषा एवं नागरी लिपि में है
इस शिलालेख में आमेर के कछवाहा राजवंश के बारे में जानकारी मिलती है
आमेर के लेख में कछवाहा राजवंश को रघुवंश तिलक कहा गया है।
इसमें आमेर के कछवाहा राजवंश के शासक - पृथ्वीराज ,भारमल,भगवंतदास, और मानसिंह का उल्लेख किया गया है इस लेख में मानसिंह को भगवन्तदास का पुत्र बताया गया है।
इस शिलालेख में मानसिंह द्वारा जमुआ रामगढ़ के दुर्ग के निर्माण का उल्लेख है ।
इस शिलालेख में में जहाँगीर की प्रशंसा की गई
15. घटियाला के शिलालेख (861 ई.)-
जोधपुर के पास घटियाला में एक स्तंभ पर उत्कीर्ण हैं।
यह लेख संस्कृत भाषा में हैं
यह शिलालेख कुक्कुक प्रतिहार की जानकारी देता हैं।
इस शिलालेख का लेखक मग हैं।
इसमें मग जाति के ब्रह्माणों का उल्लेख मिलता है
इनमें प्रतिहार नरेश कुक्कुक का वर्णन है इस अभिलेख को क्क्कुक प्रतिहार ने बनवाया था ।
16. अपराजित का शिलालेख (661 ई.)
यह शिलालेख नागदा गाँव के निकटवर्ती कुंडेश्वर के मन्दिर की दिवार पर उत्कीर्ण था।
इसकी रचना ‘दामोदर’ ने की
अपराजित के शिलालेख में 7वीं सदी के मेवाड़ के इतिहास की जानकारी मिलती है।
यह शिलालेख वर्तमान में उदयपुर में विक्टोरिया हॉल के संग्रहालय में स्थित है।
इस शिलालेख की भाषा संस्कृत है।
17. समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1485 ई. )
यह अभिलेख चित्तौड़ दुर्ग में समिधेश्वर मंदिर में स्थित है
इस लेख से मेवाड़ के शिल्पियों की जानकारी है
इसमें मोकल द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है।
18. बड़वा यूप (स्तम्भ) अभिलेख (238 -39 ई. ):-
यह अभिलेख बड़वा ग्राम कोटा में है। इसकी भाषा संस्कृत एवं लिपि ब्राह्मी है
यह अभिलेख मौखरी राजाओं का सबसे पुराना और पहला अभिलेख है।
यह तीन यूप पर खुदा है। यूप एक प्रकार का स्तम्भ है।
इस शिलालेख में बलवर्धन, सोमदेव और बलसिंह द्वारा त्रिरात्र यज्ञों के आयोजन के उपरांत मौखरी धनत्रात द्वारा अप्तोयाम यज्ञ को संपादित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
1. राज प्रशस्ति (1676 ई.)
राज प्रशस्ति मेवाड़ के शासक राजसिंह के द्वारा 1676 ई. में राजस्थान के राजसमंद जिले की राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर महाकाव्य के रूप
में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण किया गया थी।
राज प्रशस्ति विश्व
की सबसे बड़ी प्रशस्ति या विश्व का सबसे बड़ा अभिलेख है।
राज प्रशस्ति के
रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे।
राज प्रशस्ति में महाराणा अमरसिंह (मेवाड़) व जहाँगीर (मुगल) के मध्य संधि उल्लेख है।
राज प्रशस्ति को
राजसिंह प्रशस्ति भी कहा जाता है।
राज प्रशस्ति 25 काली पाषाणों की शिलाओं पर उत्कीर्ण है।
राज प्रशस्ति में मेंवाड़ के सिसोदिया
वंश (गुहिल वंश) की जानकारी मिलती है।
राज प्रशस्ति से जानकारी मिलती है कि
राजसमंद झील का निर्माण अकाल राहत कार्यों के लिये करवाया गया था।
2. कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति/विजय
स्तम्भ प्रशस्ति/विष्णु स्तम्भ प्रशस्ति (
यह प्रशस्ति चित्तौड़गढ़ किले के कीर्ति स्तंभ में कई शिलाओं पर
संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है।
इस प्रशस्ति की रचना अत्रि भट्ट ने आरम्भ की तथा इसके पुत्र महेश भट्ट ने पूर्ण की थी।
यह राणा कुम्भा की प्रशस्ति है।
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में महाराणा कुम्भा की विजयों के बारे में जानकारी मिलती
है
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में कुंभा द्वारा रचित ग्रंथों चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका, संगीत
राज,सगीत रत्नाकर, संगीत मीमांसा, सूद प्रबंध आदि का उल्लेख है
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में कुंभा की प्रमुख उपाधियों की जानकारी मिलती है इस प्रशस्ति में
कुंभा को महाराजाधिराज, अभिनव भरताचार्य, हिंदु सुरतान, राय रायन, राणो रासौ, गुरु दान गुरु, राजगुरु, हाल गुरु और सेल गुरु आदि नामों से
सम्बोधित किया गया है
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में गुहिल (सिसोदिया) वंश की
सम्पूर्ण जानकारी है
3. कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.)
यह प्रशस्ति कुम्भलगढ़ दुर्ग (राजसमन्द) में स्थित कुंभश्याम मंदिर ( इसे वर्तमान में मामादेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है यह 5 शिलाओं पर उत्कीर्ण है
इस प्रशस्ति के वास्तविक रचयिता कान्हा व्यास है।
डाॅ. गौरीशंकर ओझा के अनुसार कुंभलगढ़ अभिलेख के रचयिता कवि महेश था।
यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
कुंभलगढ़ के अभिलेख से महाराणा कुंभा की उपलब्धियों की जानकारी मिलती है।
वर्तमान में यह शिलालेख उदयपुर संग्रहालय में संरक्षित है
यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा एवं विश्वसनीय स्रोत है।
इसमें बप्पा रावल को ब्राह्मण वंशीय/विप्र वंशीय बताया गया है
इस प्रशस्ति में हम्मीरदेव चौहान को ‘विषम घाटी पंचानन’ कहा है।
यह शिलालेख संस्कृत भाषा में तथा नागरी लिपि में लिखा है।
4. रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.)
रणकपुर प्रशस्ति राजस्थान के पाली जिले के रणकपुर गाँव में चौमुखा मंदिर के स्तम्भ पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण की गई है।
रणकपुर प्रशस्ति में मेवाड़ के राजवंश एवं धरणक सेठ के वंश का वर्णन मिलता है
रणकपुर प्रशस्ति का रचयिता देपाक (दीपा या देवाक) था।
रणकपुर प्रशस्ति में गुहिल को बप्पा रावल का पुत्र बताया गया है।
रणकपुर प्रशस्ति में बप्पा रावल एवं कालभोज को अगल-अलग व्यक्ति बताया गया है।
रणकपुर प्रशस्ति में कुंभा की विजय व उपाधियों का वर्णन मिलता है।
इस लेख में नाणक शब्द का प्रयोग मुद्रा के लिए किया गया है।
5. जगन्नाथराय प्रशस्ति- (1652 ई.)
यह प्रशस्ति उदयपुर के जगदीश मन्दिर/सपनो से बना मन्दिर में लगी हुई हैं
इस प्रशस्ति में हल्दीघाटी के युद्ध का उल्लेख हैं।
इसके रचयिता कृष्णभट्ट थे
इसमें महाराणा जगतसिंह के युद्धों एवं पुण्य कार्यों का विस्तृत विवेचन है।
यह शिलालेख काले पत्थरों पर नक्काशी द्वारा बनाया गया है जो मंदिर के सभा-भवन में स्थापित किए गए हैं
6. नेमिनाथ प्रशस्ति (1230 ई.)
नेमिनाथ प्रशस्ति को लूणवसही प्रशस्ति भी कहा जाता है।
नेमिनाथ प्रशस्ति देलवाड़ा जैन मंदिर, माउण्ट आबू (सिरोही) के एक मंदिर लूणवसही जैन मंदिर/नेमिनाथ मंदिर/तेजपाल व वास्तुपाल मंदिर में है
इसकी भाषा संस्कृत है और इसे गद्य में लिखा गया है।
आबू के शासक धारावर्ष का वर्णन इसी शिलालेख में हैं
यह प्रशस्ति वस्तुपाल व तेजपाल द्वारा बनवायी गई है
इसमें आबू के परमार शासकों तथा वस्तुपाल व तेजपाल के वंश का उल्लेख है।
नेमिनाथ मंदिर प्रशस्ति से परमार वेशीय शासकों की जानकारी मिलती है।
इसकी रचना सोमेश्वर ने की थी जबकि उत्कीर्ण चण्डेश्वइर ने किया था।